प्रजासत्ताक भारत में प्रजा की सत्ता कहां है?

- January 26, 2018
26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान देशभर में सार्वजनिक रुप से लागु हुआ। सभी लोगों को जाति, धर्म, प्रदेश व लिंग के भेदभाव के बगैर उनके संवैधानिक हक्क व अधिकार समान रुप से दिए गए।

संविधान के माध्यम से सभी नागरीको को राजनैतिक तौर पर अंशतः समानता जरुर मिली लेकिन आर्थिक और सामाजिक जिवन में हजारो सालों से चली आ रही गैरबराबरी वाली व्यवस्था आजतक कायम है।

दिल्ही की गद्दी पर आजादी से लेकर आजतक बहोत सारी सरकारें आई और गई, लेकिन देश की समाज व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव नहीं आया। किसी भी सरकार ने संविधान का पुर्णरुप से पालन करने का काम नहीं किया।






सत्ता की आड में लगभग सभी सरकारों ने जातिवाद और मुडीवाद को प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से बढावा देकर अपने राजनैतिक फायदे को ध्यान में रखकर हमारे देश की एकता और अखंडितता को नुकशान करने का काम किया।

हमारा देश दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक गणतंत्र देश है, लेकिन सही माइने में देखा जाए तो भारत में कुछ मुठ्ठीभर शासकों को छोडकर बाकी प्रजा के पास कोई हक्क या अधिकार नहीं है, देश के नागरीको की हालत बिल्कुल नंपुसको जैसी हो गई है।

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में बैठे नालायक प्रतिनिधियों की वजह से देश बर्बाद होने की कगार पर खडा है।








जबतक समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, जातिवाद और मुडीवाद जैसी गैरबराबरी वाली व्यवस्था कायम है तबतक हमारा देश कतैई प्रगति नहीं कर सकता।

हमें यह असमान समाज व्यवस्था को हर हाल में खतम करना ही है, प्रकृति कभी कोई भेदभाव नहीं करती तो भला हम क्यों यह अमानवीय व्यवस्था को बनायें रखे ?

अस्पृश्यता जैसी धिनौनी प्रथा दुनिया के किसी भी देश में नहीं है, भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां पर अस्पृश्यता की वजह से देश के करोडों नागरीक प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से हररोज प्रताडित होते है।







अदाणी, अंबाणी और एस्सार के मार्गदर्शन में चल रही सरकार में गरीब, पिछडे और वंचित समुदाय के संवैधानिक हक्क व अधिकार का कोई वजुद नहीं है।

जिस देश के 1% लोगों का देश की 73% संपत्ति पर कब्जा हो, उस देश के 99% लोगों के पास जनआंदोलन ही एकमात्र विकल्प है जिनके माध्यम से वे अपने संवैधानिक हक्क व अधिकार पा सकते है।

दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जब पुरा देश EVM के खिलाफ आंदोलन कर रहा था तब सरकार में बैठे तानाशाह अपने सत्ता के नशे में मस्त थे, अगर देश बर्बाद होता है फिर भी उन्हें कोई फर्क नहीं पडता।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए लोग चिल्लाते रहे, लडते रहे, विरोध करते रहे लेकिन फिर भी सरकार में बैठे मुठ्ठीभर देशद्रोही चुनाव मे धांधली करके सत्ता पर बने रहे।

हम चाहते है की हमारे देश में अन्यायमुक्त, अपराधमुक्त, भयमुक्त और भ्रष्टाचारमुक्त शासनव्यवस्था बने। सभी लोगों को उनके हक्क व अधिकार मिले।

जातिवादी और मुडीवादी ताकतों को देश की सत्ता से बेदखल करना हमारा पहला लक्ष्य है। हमारा अंतिम मकसद समता, स्वतंत्रता, बंधुता व न्याय पर आधारित समाज और राष्ट्र का निर्माण करना है।






यह लडाई भारत के भाग्य को बदलने की लडाई है, यह लडाई जातिवाद और मुडीवाद को खतम करने की लडाई है।

जब फ्रांस, रशिया, लिबीया, दक्षिण आफ्रिका समेंत दुनिया के कई देशो में वहां के शासकों के खिलाफ क्रांति हो सकती है तो भारत में क्यों नहीं?