कोरेगांव घटना पर मनुवादी मीडिया का दलित विरोधी एजेंडा

- January 06, 2018
      पुणे के भीमा-कोरेगांव में दलितों पर हुए हमले को लेकर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल लिखते हैं कि ‘भीमा कोरेगाँव में कल ब्राह्मणवादियों ने जो हिंसा की, उसके आईने में मीडिया को देखिए। दोस्त और दुश्मन की पहचान का सही मौक़ा है। जो ख़ामोश है, वह भी आपका दुश्मन है। बल्कि ज़्यादा शातिर दुश्मन है।’


     दिलीप मंडल ने ये इस मामले की मीडिया कवरेज की तरफ इशारा किया है। दरअसल जब भी दलितों से जुड़ा कोई मामला होता है तो मनुवादी मीडिया उसे जगह नहीं देती या फिर गलत तरह से तोड़-मरोड़ कर दिखाती है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि हिंदु धर्म के कथित उंची जाति के मर्द जो पूरे देश की जनसंख्या के मात्र 8 प्रतिशत हैं वो राष्ट्रीय मीडिया के 71 प्रतिशत निर्णायक पदों पर बैठे हैं।

 



   मीडिया के जातिवाद का असल भीमा कोरेगांव में हुए दंगों की कवरेज पर भी दिख रहा है। ज्यादातर मीडिया इस मुद्दे को सही तरीके से नहीं दिखा रहे हैं लेकिन जो दिखा रहे हैं वो मामले को तोड़ मरोड़ कर दिखा रहे हैं।

   एबीपी न्यूज के हिंदी वेब पोर्टल द्वारा भीमा-कोरेगांव मुद्दें पर लिखी गई खबर हेडिंग इस प्रकार है-

‘पुणे: अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाने पर हिंदुओं-दलितों के बीच हिंसा, एक की मौत, कई गाड़ियां जलाई’

     इस पूरे खबर को इस तरह लिखा गया है जैसे दलित अंग्रेजों के एजेंट थें। हेडिंग में ही दलितों के जश्न को अंग्रेजों की जीत का जश्न बताया गया है जबकि ऐसा नहीं है। दलित समुदाय 1 जनवरी को इसलिए शौर्य दिवस मनाता है क्योंकि उस दिन जातिवादी पेशवाओं की अमानवीय क्रूरता से उनके समुदाय को आजादी मिली थी , महार रेजिमेंट ने उनपर जीत हासिल की थी।

        महार रेजिमेंट में मात्र 500 सैनिक थें और मनुवादी पेशवाओं के पास 28,000 की सेना थी, बवजूद इसके महार रेजिमेंट ने पेशवाओं की सेना को धूल चटा दी। पेशवा  ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोशक थे, इसलिए उनके लिए महार अछूत होते थें। पेशवा हमेशा उनका शोषण करते थें, उन्हें सैनिक की तरह लड़ने का हक नहीं था।

 





  यही वजह है कि जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना में महारों की रेजिमेंट ही बना दी तो वो पूरे ताकत लड़े। अंग्रेजों ने दलितों के बराबरी में खड़े होने का मौका दिया, ये उस वक्त दलित समाज के लिए बड़ी बात थी। ये लड़ाई 1818 में लड़ी गई थी। जब भारत जैसा कोई देश दुनिया के मानचित्र पर नहीं था, उस वक्त सिर्फ रियासतें थी, जिसके अलग अलग राजा हुआ करते थे।

और जहां तक अंग्रेजों के साथ मिलकर लड़ने की बात है तो आजादी से पहले सबसे ज्यादा अंग्रेजों के लिए राजपूत समाज ने लड़ा है। अंग्रेजों की सेना में राजपूतों का रेजिमेंट था जो आज भी भारतीय सेना में है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अंग्रेजों के साथ मिलकर द्वितीय विश्व युद्ध की लड़ाई लड़ी है।

कुछ दिन पहले आजादी के पहले का आरएसएस का एक पत्र भी वायरल हो रहा था जिसमे संघ के लोगों से ये अपील की गई थी कि वो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ न लड़े।

मनुवादी मीडिया ने कितनी बार इस मुद्दें को उठाया? क्या मनुवादी मीडिया ने कभी बताया कि आरएसएस और राजपूत अंग्रेजों के लिए लड़ा करते थे?

एबीपी की हेडिंग में कुछ ऐसे शब्द लिखे गए हैं..‘हिंदुओं-दलितों’ के बीच हिंसा… ,











अब सवाल उठता है कि क्या ये मनुवादी मीडिया खुले तौर पर स्वीकार कर रही है कि ये दलितों को हिन्दुओं का हिस्सा नहीं मानती ?

बता दें कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई दलितों की शौर्यगाथा है तो वहीं मनुवादियों के मुंह पर कालिख। इस महान गाथा में 500 नायकों ने हिस्सा लिया था। ये लोग बहुजन समाज के नायक हैं।

इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर हरसाल 1 जनवरी को उस महान स्थान पर जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे।