थानगढ हत्याकांड का सच

- December 31, 2017
23 सप्टेंबर 2012 को तत्कालिन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इशारो पर गुजरात के थानगढ में निर्दोष लोगों पर गैरकानुनी पुलिस फायरिंग किया गया था, जिसमें तीन दलित युवकों की बेरहेमी से हत्या कर दी गई थी।




यह धटना के 6 साल होने के बाद भी मृतक मेहुल, पंकज और प्रकाश के हत्यारो पर पुलिस व प्रशासन द्वारा कोइ कारवाई नहीं हुई है। पीडित परीवार के लोग अभी भी सरकारी न्याय का इंतजार कर रहे है।





आपको बता दे की, 16 साल का मेहुल और 18 साल का पंकज अपने मां-बाप के इकलौते बेटे थे। मृतक प्रकाश की विधवा गीताबहेन अपने 8 साल के एक मात्र बेटे के उपर जिंदा लाश की तरह जी रही है।

थानगढ शहर के लोगों ने मृतक युवकों के सम्मान में पुलिस फायरिंग की जगह से दस मिटर की दुरी पर एक भव्य 'शहिद स्मारक' बनाया है।






थानगढ हत्याकांड के मुख्य चश्मदीद गवाँह और पुलिस फायरिंग मे धायल होने वाले पीडित छनाभाई बताते है की, आनंदीबहेन पटेल के रिलेटिव और तत्कालिन एसपी हरिकृष्ण पटेल ने फायरिंग के आदेश दिए थे लेकिन सरकार द्वारा पुलिस FIR में उनका नाम तक नहीं डाला गया।

पीडितो की मांग है की, यह हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपी जाए ताकी अपराधीयों पर कडी से कडी कारवाई हो सके एवं सरकार की तरफ से यह केस संबंधित संजय प्रसाद कमीशन की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।

लेकिन सच तो यह है की, पीडितो को न्याय दिलाना तो दुर सरकार द्वारा अपराधी पुलिस ओफीसरों को प्रमोशन से नवाजा जा रहा है।






हम चाहते है की, RSS प्रेरित भाजपा सरकार अपनी जातिवादी मानसिकता से उपर उठकर थानगढ हत्याकांड के अपराधीयों पर जल्द से जल्द कानुनी कारवाई करे और पीडित परीवार के लोगों को उचित न्याय दिलाए।